रविवार, 5 अगस्त 2012

भूख के विरुद्ध

              भूख के विरुद्ध














           वि श्व की धरोहर में शामिल नहीं है  
           गंगा यमुना का उर्वर मैदान  
            जहां धान रोपती बनिहारिनें   
           रोप रही हैं  
           अपनी समतल सपाट सी जिंदगी   
           उनकी झुकी पीठें  
           जैसे पठार हो कोई 
           और निर्मल झरना  
            झर रहा हो लगातार 
           उनके गीतों में 
           धान सोहते हुए सोह रही हैं  
           अपने देश की समस्याएं  
           काटते हुए काट रही हैं  
           भूख की जंजीर 
           और ओसाते हुए 
           छांट रही हैं  
          अपने देश की तकदीर   
          लेकिन  
           अब उनके धान रोपने के दिन गये  
           धान सोहने के दिन गये 
           धान काटने के दिन गये  
           धान ओसाने के दिन गये 
            कोठली में धान भरने के दिन गये 
            अब धान सीधे मंडियों में पहुंचता है 
            सड़ता है भंडारों में 
            और इधर पेट 
            कई दिनों से अनशन पर बैठा है 
            भूख के विरुद्ध 
            जबसे काट लिए हैं इनके हाथ 
            मशीनों ने  बड़ी संजीदगी से।


संपर्क - आरसी चौहान (प्रवक्ता-भूगोल
             राजकीय इण्टर कालेज गौमुख,  
      टिहरी गढ़वाल उत्तराखण्ड 249121
             मोबा0-09452228335 
            ईमेल- chauhanarsi123@gmail.com

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

आरसी चौहान की कविता-वजूद




वजूद
कितना ही   
खारिज करो  
साहित्य विशेषज्ञों 
लेकिन
याद करेंगे  लोग मुझे 
अरावली पहाड़- सा 
घिसा हुआ।

संपर्क-   आरसी चौहान (प्रवक्ता-भूगोल)
                 राजकीय इण्टर कालेज गौमुख, टिहरी गढ़वाल
                 उत्तराखण्ड249121
                 मेाबा0-09452228335
                 ईमेल-chauhanarsi123@gmail.com

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

आरसी चौहान की कविता-पृथ्वी के पन्नों पर मधुर गीत

 आरसी चौहान की कविता























पृथ्वी के पन्नों पर मधुर गीत
आज पहली बार
अम्लान सूर्य
हंसता हुआ
पूरब की देहरी लांघ रहा है
लडकियां हिरनियों की माफिक
कुलांचे भर बतिया रहीं
हवाओं के साथ
पतझड़ में गिरते पत्ते
रच रहे हैं
पृथ्वी के पन्नों पर मधुर गीत
हवा के बालों में
गजरे की तरह गुंथी
उड़ती चिड़ियां
पंख फैलाकर नाप रहीं आकाश
समुद्र की अठखेलियों पर
पेड़ पौधे पंचायत करने जुटे हैं
गीत गाती नदी तट पर
स्कूल से लौटे बच्चे
पेड़ों पर भूजा चबाते
खेल रहे हैं ओलापाती
युवतियां बीनी हुई
ईंधन की लकड़िया
बांध रहीं तन्मय होकर
चरकर लौटती गायें
पोखरे का पानी
पी जाना चाहतीं
एक सांस में जी भरकर
चौपाल में ढोल मज़ीरे की
एक ही थाप पर
नाच उठने वाली दिशाएं   
बांध रही घुंघरू
थिरक थिरक
अब जबकी सोचता हूं
कि सपने का मनोहारी दृष्य
कब होगा सच ?


संपर्क- आरसी चौहान (प्रवक्ता-भूगोल)                                                                                                                                         राजकीय इण्टर कालेज गौमुख, टिहरी गढ़वाल उत्तराखण्ड 249121                                                                                                                                             मोबा0-09452228335 ईमेल- chauhanarsi123@gmail.com

बुधवार, 25 जनवरी 2012

आरसी चौहान की कविता-कठघोड़वा नाच


आरसी चौहान की कविता

















                     आरसी चौहान
  


कठघोड़वा नाच  

रंग-  बिरंगे कपड़ों में ढका कठघोड़वा 
घूमता था गोल- गोल 
गोलाई में फैल जाती थी भीड़
ठुमकता था टप-टप
डर जाते थे बच्चे 
घुमाता था मूड़ी 
मैदान साफ होने लगता उधर   
बैण्ड बाजे की तेज आवाज पर
कूदता था उतना ही ऊपर 
और धीमे,पर ठुमकता टप-टप
जब थक जाता
घूमने लगता फिर गोल-गोल
बच्चे जान गये थे 
काठ के भीतर नाचते आदमी को
देख लिए थे उसके घुंघरू बंधे पैर 
किसी-किसी ने तो
घोड़े की पूंछ ही पकड़कर
खींच दी थी 
वह बचा था
लड़खड़ाते-लड़खड़ाते गिरने से
वह चाहता था 
कठघोड़वा से निकलकर  सुस्ताना 
कि वह जानवर नहीं है
लोग मानने को तैयार नहीं थे  
 कि वह घोड़ा नहीं है 
बैंड बाजे की अन्तिम थापपर
थककर गिरा था
कठघोड़वा उसी लय में धरती पर  
लोग पीटते रहे तालियां बेसुध होकर 
उसके कंधे पर
कठघोड़वा के  कटे निशान 
आज भी हरे हैं
जबकि कठघोड़वा नाच और वह 
गुमनामी के दौर से 
 गुजर रहें हैं इन दिनों ।

संपर्क-   आरसी चौहान (प्रवक्ता-भूगोल)
                 राजकीय इण्टर कालेज गौमुख, टिहरी गढ़वाल
                 उत्तराखण्ड249121
                 मेाबा0-09452228335
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मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

आरसी चौहान की कविता-नथुनिया फुआ



                                         आरसी चौहान

नथुनिया फुआ

ठेठ भोजपुरी की बुनावट में 
संवाद करता 
घड़रोज की तरह कूदता
पूरे पृथ्वी को मंच बना 
गोंडऊ नाच का नायक
नथुनिया फुआ”   
कब लरझू भाई से
नथुनिया फुआ बना
हमें भी मालूम नहीं भाई
हां , वह अपने अकाट्य तर्कों के
चाकू से चीड़ फाड़कर 
कब उतरा हमारे मन में
हुडके के थाप और
भभकते ढीबरी के लय-ताल पर
कि पूछो मत रे भाई
उसने नहीं छोड़ा अपने गीतों में
किसी सेठ-साहूकार  
राजा-परजा का काला अध्याय 
जो डूबे रहे मांस के बाजार में आकंठ 
और ओढे रहे आडंबर का 
झक्क सफेद लिबास 
माना कि उसने नहीं दी प्रस्तुती
थियेटर में कभी
रहा कभी पुरस्कारों की
फेहरिस्त में शामिल
चाहता तो जुगाड़ लगाकर
बिता सकता था
बाल बच्चों सहित 
राज प्रसादों में अपनी जिंदगी के   
आखिरी दिन पर ठहरा वह निपट गंवार 
गंवार नहीं तो और क्या कहूं उसको 
लेकिन वाह रे नथुनिया फुआ 
जब तक रहे तुम जीवित
कभी झुके नहीं हुक्मरानों के आगे 
और भरते रहे सांस
गोंडऊ नाच के फेफडों में अनवरत 
जबकि.....   
आज तुम्हारे देखे नाच के कई दर्शक  
ऊँचे ओहदे पर पहुंचने के बाद 
झुका लेते हैं सिर
और हो जाते शर्मशार ..................

संपर्क-   आरसी चौहान (प्रवक्ता-भूगोल)
                 राजकीय इण्टर कालेज गौमुख, टिहरी गढ़वाल
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