एक बार फिर
सब जन मरेंगे
आपकी स्मृतियां,यश,गुण,प्रतिष्ठा
सब दफन हो जाएगा
जी चुकी पृथ्वी अपनी
उम्र का
अधिकांश हिस्सा
सूर्य पार कर चुका
अपनी उम्र का युवावस्था
मरेगा सूर्य
जब लाल दानव में बदलते
हुए
आगोश में समा जाएंगे
उसके पार्थिव पुत्र
बुद्ध,शुक्र और पृथ्वी
जलता हुआ सूर्य
सबको एक चम्मच राख
में बदल देगा
उस दिन तुम्हारे लिखे
हुए
तमाम मोटे मोटे ग्रंथ
तुम्हारी आकांक्षाओं
और महत्वाकांक्षाओं
का ज़खीरा
सिमट जायेगा एक बिंदु
में
बिंदु के विस्फोट होने
और ब्रह्माण्ड के बनने
तक
पृथ्वी अकुलायी हुई
निकलेगी
सृष्टि का द्वार खोलते हुए एक बार फिर।
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